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कुशीनगर,मशहूर शायर डॉक्टर शमसुल आरफीन उर्फ शम्स सिवानी के अश्आर के लोग दीवाने. 

जब भी लिखता हूं प्यार के नगमें- अश्क अल्फाज मिटा देते हैं,– डॉक्टर शम्स सिवानी।

संवाददाता कुशीनगर फिरोज अंसारी अश्क 9 TV समाचार भारत UP बिहार MEDIA

कुशीनगर मशहूर शायर डॉक्टर शमसुल आरफीन उर्फ शम्स सिवानी का बचपन से शायरी करने का जौक व शौक रहा है मूलतः शम्स सिवानी साहब बिहार के सिवान जिला के मैरवा नगर पंचायत के ग्राम सुमेरपुर के निवासी हैं इनका जन्म 18 -1- 1956 में सुमेरपुर गांव में हुआ इनकी प्राइमरी की तालीम मैरवा मकतब एवं हाई स्कूल हरिराम हाई स्कूल मैरवा से हुई कक्षा 12वीं की शिक्षा उत्तर प्रदेश बनकटा जिला देवरिया से हुई स्नातक की पढ़ाई सिवान डी ए बी महाविद्यालय से प्राप्त किये बी ए ड गोरखपुर यूनिवर्सिटी से तथा डी डी एस दिल्ली संस्कृत यूनिवर्सिटी से किये। इसके बाद महात्मा बुद्ध की धरती कसया कुशीनगर में देलही दांत घर निजी क्लीनिक पर 40 वर्षों तक लगातार सेवा दिए इनके पिता स्वर्गीय डॉक्टर जैनुल आबेदीन मिलिट्री रिटायर रहे इनके चार भाई हैं जिनमें सबसे बड़े सिवानी साहब है पूरी जिंदगी दंत चिकित्सा में लगा दिए इसके बावजूद शायरी का फन हमेशा इनके साथ रहा स्कूल कॉलेज के समय से अब तक शायरी करते हैं इनके शायरी के लोग आज भी दीवाने हैं इनके अश्आर दिल को झकझोड़ के रख देते हैं बहुत से साहित्यिक लोग इनकी अश्आर को सुनकर लिखना पढ़ना चालू कर दिए और आज मंचों पर प्रस्तुति भी देते हैं डॉक्टर शमसुल आरफीन उर्फ शम्स सिवानी की कुछ मकबूल अश्आर इस तरह हैं।-फसाहत उसकी आंखों में है नजरों की जया बनकर, भुलाना उसको गोया अपनी ही आंखें मिटा देना।-बसद खूलूस वह मिलता है टूट कर मुझसे, मैं डर रहा हूं कोई हादसा न हो जाए। दामन में मेरे हिज़्र की नेमत को सौंप कर, वह पूछता है और बता क्या मिजाज है। दिल तो सीने में रखते हैं लेकिन ,दर्द को दिल में कौन रखते हैं। खुश कोई भी रहनुमा होता नहीं ,शहर में जब हादसा होता नहीं। तेरे किरदार अलामत हैं तमद्दुन की तेरी ,तू सर उठा के चले या के सर झुका के चले ।इस तरह के बुलंदी पर अश्आर कहने वाले आज उम्र के 70 वें पड़ाव में भी शायरी का जौक और शौक रखते हैं बड़े मंचों पर भी आना जाना रहता है इन्हें गीत गजल के साथ-साथ भोजपुरी में भी महारत हासिल है।

बिहार में पैदा होने के बाद भी इन्होंने यूपी के कसया कुशीनगर धरती को चुना और कसया कुशीनगर के होकर रह गए । कसया पिपरहिया वार्ड नंबर 12 वीर अब्दुल हमीद नगर में रहते हैं इनके अखलाक खूलूस के लोग कायल हैं जब इनसे बातचीत हुई तो इन्होंने बताया कि आज 40 वर्षों से मैं कसया में ही रहता हूं निजी घर भी है। जब इनसे पूछा गया कि साहित्यकारों के लिए आप क्या कहना चाहते हैं तो इन्होंने बताया कि साहित्यकार कलम का सिपाही होता है उसे कलम का पास रखते हुए हमेशा सच पर ही कलम उठानी चाहिए जो भी लिखे सच लिखे जैसे एक सहाफी से उम्मीद की जाती है।

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