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बाजुओं को जो बचाते हैं तो पर काटता है, कितनी मुश्किल से परिंदों का सफर कटता है –डॉ०फरीद कमर

एक शाम मुस्लिम अंसारी के नाम कार्यक्रम संपन्न 

संवाददाता कुशीनगर

फिरोज अंसारी अश्क 9 टीवी समाचार भारत UP बिहार MEDIA 

एक शाम संत कबीर नगर के ख़लीलाबाद स्थित जयपुरिया स्कूल के खूबसूरत हॉल में मुस्लिम अंसारी के नाम से आयोजित कार्यक्रम (शेअ़्री महफ़िल) बड़ी सफलता के साथ संपन्न हुई,

जिसमें 15 चुनिंदा शायरों ने अपनी शायरी व कविताएं प्रस्तुत कीं. इस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रसिद्ध साहित्यकार व शायर मोहतरम सरवत जमाल साहब की मौजूदगी में शायरों ने अपनी शायरी से प्रोग्राम को सफलता दिलायी

शम्भू नाथ मेमोरियल हॉस्पिटल के डायरेक्टर एंव प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. एन एन श्रीवास्तव “बेचैन खलीलाबादी” के संरक्षण में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अशरफ़ अली साहब ने की

‎अपनी शायरी और रचनायें प्रस्तुत करने वालों मे विशिष्ट अतिथि के साथ शारिक ख़लीलाबादी, वसीम खा़न वसीम, डॉ. ज़ैद कैमूरी, डॉ. फ़रीद क़मर, अर्शी बस्तवी, डॉ. इम्तियाज समर, डॉ. तारिक़ अर्शी, पवन सबा, नूरुद्दीन नूर, महमूद ख़लीलाबादी, डॉ० अंबर बस्तवी और मुशायरे के संचालक हामिद ख़लीलाबादी के नाम अहम हैं

‎शहर के वरिष्ठ उपस्थित लोगों में बड़ी तादाद के साथ मोहतरम मुहम्मद अहमद साहब जिला पंचायत सदस्य (ख़लीलाबाद विधान सभा 313) के सपा के मजबूत भावी

‎प्रत्यसी भी मौजूद रह कर शेर व शायरी का भर पूर आनन्द लिया जो उल्लेखनीय है

‎मालूम हो कि कार्यक्रम के पहले चरण में जैपुरिया स्कूल द्वारा सभी शायरों एवम अतिथियों को फूल माला एंव अंगवस्त्र तथा मोमेन्टो से सम्मानित किया गया।

शायरों के मुन्तख़ब पसन्दीदा अश्आ़र-

वहाँ भी पेट का ही मस्अ्ला है,जहाँ पैरों में घुंगरू बोलते हैं ,

सरवत जमाल ने सुना कर वाह वाही बटोरी।

हम अपने ही गुमान व यक़ीं के नहीं रहे,

तुझसे जुदा हुए तो कहीं के नहीं रहे,

शारिक़ ख़लीलाबादी पढ़ा तो मजमा झूम उठा

बाज़ुओं को जो बचाते हैं तो पर कटता है,

कितनी मुश्किल से परिन्दों का सफ़र कटता है।डॉ० फ़रीद क़मर ने सुनाकर मंच कोउचाई दी।जज़्बा ए शौक़ लेकर जिधर जाइये, बन के ख़ुश्बू फ़ज़ा में बिखर जाइये ,अरशी बस्तवी ने पढ़ कर महफिल लूट लिए।मतलब न बुग़ज़ से न अदावत से वास्ता, रखते नहीं हैं हम कभी नफ़रत से वास्ता, महमूद ख़लीलाबादी ने सुनाया।

जिसमें न थी ख़ुलूस की ख़ुश्बू ज़रा सी भी,

ऐसी वफ़ा तो हम ने निभाई कहीं नहीं, डॉ. ज़ैद कैमूरी ने पढ़ा तो महफिल में चार चांद लग गया।हमें मालूम है कि तुम हमें मिटने नहीं दोगे,

हमारे ही पसीने से तुम्हारी कार चलती है,

डॉ. इम्तियाज़ समर ने सुनाया तो महफिल तालियों से गूंज उठी।

बेख़ुदी से हम ज़रा जब होश में आने लगे,

सर तेरी दीवार के पत्थर से टकराने लगे, वसीम खा़न वसीम ने सुना कर श्रोताओं में जोश भर दिया।

बहुत मजबूर होता जा रहा हूं ,मैं तुमसे दूर होता जा रहा हूं,

नूरुद्दीन नूर ने सुनाया तो एक अलग छटा महफिल में छा गयी।

आखिर मैं मेहमान खूसूसी ने सबका आभार व्यक्त किया तहे दिल से शुक्रिया अदा किया।

 

 

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